भूमिका
माँ दुर्गा जगत् की आदिस्वरूपा माता हैं । आदिशक्ति, आदिमाया, महाशक्ति, पराशक्ति इत्यादि अनेक नामों से माँ के भक्त उन्हें पुकारते हैं और वे भी विभिन्न स्वरूपों में अपने आप की अभिव्यक्ति करते हुए अपना वरद हस्त अपने बालकों के शीश पर रखती हैं । इनके नव स्वरूपों के दर्शन चैत्र और शारदीय नवरात्रि अथवा नवरात्र के पावन पर्व पर होते है । इस समय मन्दिरों में अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है और प्रतिदिन माँ का पूजन एवं माँ की कथा का श्रवण और कीर्त्तन होता है । प्रात: सायं होने वाली आरती की घण्टियों की गूंज वातावरण को पवित्र करते हुए दूर-दूर तक सुनायी देती है । माँ के यह नव स्वरूप बड़े मनभावन और लोक-लुभावन हैं । और इन सभी स्वरूपों के साथ जुड़ी हैं माँ की भली-सी, भोली-सी कहानियाँ । इन्हीं कहानियों को लेकर आया है कथाकुंज अपने सहृदय पाठकों के लिये । प्रत्येक स्वरूप की कहानी के साथ पाठकगण उस स्वरूप के ध्यान-मन्त्र का रसास्वादन भी कर सकते हैं । कथाओं के स्रोत का नाम भी प्रबुद्ध पाठक देख पायेंगे ।
नवदुर्गा की ये कहानियाँ अधिक कुछ नहीं करतीं, बस केवल जिज्ञासा रूपी शिशु के मुख को माँ के दूध-भरे आँचल तक पहुँचाने का कार्य करती हैं । दुग्धपान कराती माँ के वक्ष से सटा शिशु जैसे बीच-बीच में रुक कर माँ को पल भर अपलक दृष्टि से निहारने लगता है, कुछ वैसे ही इन छोटी-छोटी कहानियों का आचमन करता हुआ पाठक अपनी मनोभूमि में मातारानी के दर्शन करने में तन्मय हो जाता है । माँ की सरल-सुबोध कहानियाँ सीधे माँ के चरणों में ले जाती है ।
लीजिए, आ गया समय नवरात्रि का, शैलपुत्री के स्वागत का, पहाड़ों वाली के पाँव पखारने का ! मानो माँ महागौरी अपने प्रति आकर्षण जगाने और अनुराग बढ़ाने साधक के संसार में स्वयं कृपापूर्वक पधारी हैं ।
योगदान
Anshika Shukla – all artwork
Riddhi Botadra – prose
Dr. Kiran Bhatia – original research & editor


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